Monday, March 14, 2011

गैर मौखिक व्यवहार (Non-verbal Vehaviour)

शारीरिक भाषा अमौखिक संचार,का एक रूप है जिसे शरीर की मुद्रा, इशारों, और आँखों की गति के द्वारा व्यक्त किया जाता है. मनुष्य अनजाने में ही इस तरह के संकेत भेजता भी है और समझता भी है. अक्सर कहा जाता है कि मानव संचार का 93% हिस्सा शारीरिक भाषा और परा भाषीय संकेतों से मिलकर बना होता है जबकि शब्दों के माध्यम से कुल संचार का 7% हिस्सा ही बनता है. लेकिन 1960 के दशक में इस क्षेत्र में कार्य करके ये आंकड़े देने वाले शोधकर्ता एल्बर्ट मेहराबियन ने कहा था कि ये दरअसल उनके अध्ययन के परिणाम के आधार पर हो रही एक गलतफहमी है. अन्य लोगों ने जोर दिया कि 'अनुसन्धान के आधार पर संचार में छिपे अर्थों का 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा अमौखिक व्यवहार से प्रकट होता है. शरीर की भाषा किसी के रवैये और उसकी मनःस्थिति के बारे में संकेत दे सकती है. उदाहरण के लिए, यह आक्रामकता, मनोयोग, ऊब, आराम की स्थिति, सुख, मनोरंजन सहित अन्य कई भावों के संकेत दे सकती है. लोगों को पढ़ने की तकनीक अक्सर प्रयोग की जाती है. उदाहरण के लिए, साक्षात्कार के दौरान आमतौर पर शारीरिक भाषा को प्रतिबिंबित करके लोगों को निश्चिन्त अवस्था में लाने के लिए किया जाता है. किसी की शारीरिक भाषा को प्रतिबिंबित करना इस बात की तरफ संकेत देता है कि उसकी बात समझी जा रही है.
शारीरिक भाषा के संकेत का संचार से अलग भी कोई लक्ष्य हो सकता है. दोनों ही लोगों को ये बात ध्यान में रखनी होगी. पर्यवेक्षक अमौखिक संकेतों को कितना महत्व देते हैं ये वो स्वयं निर्धारित करते हैं. संकेतकर्ता अपने संकेतों को स्पष्ट करके अपने कार्यों की जैविक उत्पत्ति को प्रदर्शित करते हैं. शारीरिक अभिव्यक्तियाँ जैसे कि हाथ हिलाना, उंगली से इशारा करना, छूना, और नज़र नीचे करके देखना ये सभी अमौखिक संचार के रूप हैं. शरीर की गति और अभिव्यक्ति के अध्ययन को काइनेसिक्स या गतिक्रम विज्ञान कहते हैं. जब मनुष्य कुछ कहता है तो साथ ही अपने शरीर को गति देता है क्योंकि जैसा कि शोधकर्ताओं ने प्रदर्शित किया है. इससे 'संचार के कठिन होने पर भी बात कहने और समझने के लिए मानसिक प्रयास को मदद मिलती है.' शारीरिक अभिव्यक्तियाँ उस व्यक्ति के बारे में बहुत सी बातें प्रकट करती हैं जो उनका उपयोग कर रहा है. उदाहरण के लिए, इशारों द्वारा किसी खास बिंदु पर बल दिया जा सकता है या एक संदेश को आगे बढाया जा सकता है, आसन संचार में आपकी ऊब या रुचि को प्रदर्शित कर सकता है और स्पर्श प्रोत्साहन या चेतावनी जैसे भाव प्रकट कर सकता है.
• सबसे बुनियादी और शक्तिशाली शारीरिक भाषा संकेतों में एक है किसी व्यक्ति द्वारा छाती के पास अपनी दोनों भुजाएं बांधना . स्याह संकेत देता है कि वो व्यक्ति अनजाने में ही अपने और अपने आस पास के लोगों के बीच एक बाधा या दीवार बना रहा है. इसका मतलब ये भी हो सकता है कि उस व्यक्ति कि भुजाएं ठंडी हो रही हैं. यह स्थिति और स्पष्ट हो जाती है यदि वह व्यक्ति भुजाएं रगड़ता है. जब पूरी स्थिति शांतिपूर्ण हो तो इसका मतलब ये हो सकता है कि जिस बात पर चर्चा हो रही है उसके बारे में व्यक्ति गहराई से कुछ सोच रहा है. लेकिन एक गंभीर या टकराव की स्थिति में, इसका ये मतलब हो सकता है कि व्यक्ति विरोध व्यक्त कर रहा है. यह मतलब विशेष रूप से तब प्रदर्शित होता है जब वह व्यक्ति वक्ता से दूर जाने वाली और झुका होता है. एक कठोर या भावहीन चेहरे की अभिव्यक्ति अक्सर प्रत्यक्ष शत्रुता का संकेत समझी जाती है.
• लगातार आँखों में आँखें डालकर देखना यानि नज़रों का संपर्क बनाये रखने का मतलब होता है कि वक्ता क्या कह रहा है उसके बारे में व्यक्ति सकारात्मक सोच रखता है. इसका मतलब ये भी हो सकता है कि व्यक्ति को वक्ता पर इतना विशवास नहीं है कि वो बात करते समय वक्ता पर से अपनी नज़र हटा ले. नज़रों का संपर्क बनाये रखने में कमी नकारात्मकता का संकेत देती है. दूसरी ओर, चिंता या व्यग्रता का शिकार रहने वाले लोग अक्सर बिना किसी असुविधा के आँखों का संपर्क बनाने में असमर्थ रहते है. आँखों का संपर्क बनाना यानि नज़रें मिलकर बात करना अक्सर एक माध्यमिक और भ्रामक संकेत माना जाता है क्योंकि हमें इस बात की सीख बहुत शुरूआती स्तर से दी जाती है कि बोलते समय नज़रें मिलाकर बात करनी चाहिए. यदि कोई व्यक्ति आपकी आँखों में देख रहा है लेकिन उसकी भुजाएं छाती पर एक दुसरे से बंधी हुई हैं तो इस संकेत का मतलब ये है कि उस व्यक्ति को कोई चीज़ परेशां कर रही है और वो उस बारे में बात करना चाहता है. या नज़र से संपर्क बनाये हुए भी यदि कोई व्यक्ति इसके साथ साथ कोई निरर्थक कार्य या गति कर रहा है, यहाँ तक की आपको सीधे देखते हुए भी ऐसा कर रहा है तो इसका मतलब ये है कि उसका ध्यान कहीं और है. साथ ही ऐसे तीन मानक क्षेत्र भी हैं जहाँ देखना मनुष्य की तीन अलग-अलग मनःस्थिति को प्रदर्शित करता है. यदि व्यक्ति नज़र से पहले एक आँख पर दृष्टि डालता है फिर दूसरी और फिर माथे पर देखता है तो इसका मतलब ये है कि वो सामने वाले पर अधिकारपूर्ण भाव या स्थिति प्रकट कर रहा है. अगर वो पहले नज़र एक और फिर दूसरी आँख पर दृष्टि डेट हैं और उसके बाद नाक को देखता है तो इसका मतलब होता है इस वो एक ऐसे संचार का हिस्सा हैं जहाँ दोनों पक्ष बराबर स्तर रखते हैं और उनमें से कोई भी एक दुसरे से श्रेष्ठ नहीं है. आखिरी तरीका है कि दोनों आँखों में देखने के बाद होठों पर नज़र डाली जाए. यह रूमानी भावनाओं का एक मजबूत संकेत है.
• यदि निगाहें बचाकर बात की जाए या कानों को छुआ जाए या ठोड़ी को खरोंचा जाए तो ये संकेत करता है कि बात पर किसी तरह का अविश्वास है. जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की बात से सहमत नहीं है तो उसका ध्यान इधर उधर भटकता दिखता है और आँखें लम्बे समय तक सकहिं दूर देखती रहती हैं.
• सर का एक तरफ झुकाए रखना ऊबने का संकेत देता है यही संकेत तब भी मिलता है जब आप लगातार वक्ता की आँखों में देख रहे हैं लेकिन आपकी नज़र उसपर पूरी तरह केन्द्रित नहीं है. सर का एक तरफ झुका होना गर्दन में दर्द या दृष्टिमंदता का भी संकेत हो सकता है या फिर ये इस बात का भी संकेत दे सकता है कि श्रोता में कोई दृष्टिगत दोष है.
• बातों में रुचि का संकेत आसन या फिर काफी देर तक आँखों से संपर्क बनाये रखने से मिलता है. जैसे कि खड़े होकर ध्यान से सुनना.
• छल या किसी जानकारी को छुपाने की बात का संकेत तब मिलता है जब कोई बात करते समय अपना चेहरा छूता रहता है. बहुत ज्यादा पलक झपकाना इस बात का जाना माना संकेत है कि कोई झूठ बोल रहा है. हाल ही में, ये सबूत सामने आया है कि पलकें बिलकुल ना झपकाना भी झूठ बोलने को प्रदर्शित करता है और ये संकेत ज्यादा पलकें झपकाने की तुलना कहीं ज्यादा विश्वसनीय है.
यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि कुछ लोग (जैसे कि कुछ निश्चित अक्षमता वाले लोग या आत्मानुचिंतक वर्णक्रम वाले लोग) शारीरिक भाषा को कुछ अलग तरीके से समझते और प्रयोग करते हैं या कई बार कतई नहीं समझते या प्रयोग करते. उनके इशारों और चेहरे के भावों (या उनकी कमी) की व्याख्या यदि सामान्य शारीरिक भाषा के अनुसार की जाये तो कई बार ग़लतफ़हमी और गलत व्याख्या कर दी जाती है (विशेषकर यदि शारीरिक भाषा को बोली जा रही भाषा की तुलना में ज्यादा प्राथमिकता दी जाए). यह भी बताया जाना चाहिए कि अलग-अलग संस्कृति के लोग अलग-अलग तरीकों से शारीरिक भाषा की व्याख्या कर सकते हैं. उदाहरण सूची;
• घुटनों पर हाथ: तत्परता इंगित करता है.
• कूल्हों पर हाथ: अधीरता इंगित करता है.
• अपनी पीठ के पीछे अपने हाथों को बांधना: स्वयं पर नियंत्रण इंगित करता है.
• सिर के पीछे हाथ बंधना: विश्वास को इंगित करता है.
• एक पैर कुर्सी की बांह के ऊपर रखते हुए बैठना: उदासीनता इंगित करता है.
• पैरों और पगों को एक निश्चित दिशा में रखना: वो दिशा जिसके लिए सबसे ज्यादा रूचि महसूस की जाती है.
• बंधी हुई भुजाएं: अधीनता को इंगित करता है.
शारीरिक भाषा अमौखिक संचार का एक रूप है जिसमें किसी विशेष शैली के इशारे, आसन, और शारीरिक चिन्ह दूसरों के लिए संकेत की तरह कार्य करते हैं. मनुष्य कभी-कभी अनजाने में हर वक़्त अमौखिक संकेत का आदान-प्रदान करता रहता है.
कुछ शोधकर्ताओं ने कुल संचार में अमौखिक संचार को 80 प्रतिशत जितने बड़े हिस्से का दावेदार माना है जबकि हो सकता है कि ये 50-65 प्रतिशत तक ही हो. विभिन्न अध्ययनों से अलग-अलग महत्व का होना पाया गया है जिनमें से कुछ से पता चलता है कि प्रायः संचार चेहरे के भावों के ज़रिये ही कर लिया जाता है यानी बोली गई बातों की तुलना के 4.3 गुना अवसरों पर चेहरे के भाव ही संचार का माध्यम बनते हैं. दुसरे अध्ययन के अनुसार चेहरे के किसी शुद्ध भाव की तुलना में सपाट ध्वनि में कही गई बात चार गुना ज्यादा बेहतर ढंग से समझी जा सकती है. एल्बर्ट मेहराबियन 7% -38% -55% का एक नियम खोजने के लिए जाने जाते हैं जो कि ये प्रदर्शित करता है कि क्रमशः शब्द, स्वर और शारीरिक भाषा का कुल संचार में कितना योगदान है. हालांकि वो सिर्फ ऐसे मामलों की बात कर रहे थे जहाँ इस तरह के भाव या रवैये प्रकट किये जाते हैं जिनमें एक व्यक्ति ये कह रहा हो 'मुझे तुमसे कोई समस्या नहीं है!' जब लोग आमतौर पर आवाज के स्वर पर और शारीरिक भाषा पर ध्यान देते हैं बजाये कही गई चीज़ों के. यह एक आम गलत धारणा है कि ये सभी प्रतिशत सभी तरह के संचार के लिए लागू है.
अंतर्वैयक्तिक स्थान एक तरह के मनोवैज्ञानिक बुलबुले की तरह है जो हम तब महसूस कर सकते हैं जब कोई हमारे बहुत करीब खड़ा हो. अनुसंधान से पता चला है कि उत्तर अमेरिका में अंतर्वैयक्तिक स्थान के चार विभिन्न क्षेत्र हैं. पहला क्षेत्र है अन्तरंग जो कि छूने की स्थिति से लेकर अठारह इंच की दूरी तक होता है. अंतरंग दूरी वो स्थान है जिसके भीतर हम अपने प्रेमी, बच्चों, साथ ही साथ निकट परिवार के सदस्यों और दोस्तों को ही आने की अनुमति देते हैं. दूसरा क्षेत्र व्यक्तिगत दूरी कहा जाता है जो कि हमसे एक हाथ की दूरी से शुरू होता है; जोकि हमारे शरीर से अठारह इंच से शुरू होकर चार फीट दूर तक जाता है. हम दोस्तों या सहकर्मियों के साथ बातचीत करते समय और समूह चर्चाओं के दौरान व्यक्तिगत दूरी का प्रयोग करते हैं. अंतर्वैयक्तिक स्थान का तीसरा क्षेत्र सामजिक दूरी कहा जाता है और ये आपसे चार फीट दूर से शुरू होकर आठ फीट तक जाता है. सामाजिक दूरी अजनबियों, नए बने समूहों और नए परिचितों के लिए आरक्षित होती है. चौथा क्षेत्र सार्वजनिक दूरी कहा जाता है और ये उस पूरे स्थान पर होता है जो आपसे आठ फीट से अधिक दूरी पर हो. यह क्षेत्र भाषणों, व्याख्यानों, थियेटर आदि के लिए प्रयोग होता है आवश्यक रूप से सार्वजनिक दूरी का क्षेत्र वह क्षेत्र है जो श्रोताओं के बड़े समूह के लिए आरक्षित हो. लोग आमतौर पर शरीर की भाषा के माध्यम से अन्य लोगों में यौन रुचि प्रदर्शित करते हैं, हालांकि इसका सटीक रूप और सीमा संस्कृति, युग और लिंग के हिसाब से बदलती है. इस तरह के कुछ संकेतों में शामिल हैं अतिरंजित इशारे और गतियाँ, गूँज और प्रतिबिंबित करना, घेरती हुई दृष्टि से देखना, पैरों को एक दुसरे पर चढ़ाना, घुटने किसी की तरफ इंगित करना, बाल उछालना या छूना, सर मोड़ना, पेडू को घुमाना, कलाई दिखाना, कपडे ठीक करना, हँसना, या मुस्कुराना, नज़रें मिलाना, छूना, खेलना, या करीब आना. लैंगिक रूप से उत्तेजित होने पर मनुष्य कई शारीरिक संकेत भी देते हैं जैसे पुतली का फैलना.
हाल ही में, मानव स्वभावजन्य संकेतों के अध्ययन में भारी रुचि देखी गई है. इन संकेतों का अध्ययन संवादात्मक और अनुकूली मानव मशीन प्रणाली विकसित करने के लिए उपयोगी हो सकती है. अनैच्छिक मानवीय भाव जैसे कि आँखों को मीचना, ठोढ़ी को आराम देना, होठों को छूना, नाक खुजाना, सर खुजाना, कान खुजाना, और उँगलियों को आपस में मोड़ना जैसे कुछ उपयोगी संकेत कुछ विशेष बातों के लिए कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ देते हैं. कुछ शोधकर्ताओं ने इन भावों और संकेतों को शैक्षिक प्रयोगों के विशिष्ट विषयों में उपयोग करने की कोशिश की है
हर कोई अपनी भावना या विचार का इजहार करने के लिए किसी न किसी तरीके का इस्तेमाल करता है। यह आवश्यक नहीं है कि संवाद कायम करने के लिए हमेशा जुबान से बोले जाने वाले शब्दों का ही इस्तेमाल किया जाए। कभी कभी शरीर की भाषा जुबान से अधिक स्पष्ट और ताकतवर होती है। कई बार वक्ता अपनी बातों के साथ कई तरह की भाव-भंगिमाओं का इस्तेमाल करते हैं। यह वक्ता द्वारा बोली जाने वाली बातों को सकारात्मक या नकारात्मक तरीके से मदद करता है। इतना ही नहीं यह वक्ता के बारे में उन बातों को भी बताता है, जो वक्ता कहना नहीं चाहता है। मसलन उसकी सोच और विचार के बारे में जाने-अनजाने कई राज उगल देती हैं हमारी भाव-भंगिमाएं।कई बार हम वाक्य को अधूरा छोड़ कर उसे भाव भंगिमाओं या शरीर की भाषा के माध्यम से पूरा करते हैं, क्योंकि कई बार कुछ बातें बोलने में असुविधाजनक होती है। कई बार हम जुबान से बोले जाने वाले एक साधारण से वाक्य या शब्द को शारीरिक हाव-भाव से एक विशेष अर्थ भी देते हैं।इसलिए शारीरिक हाव-भाव जैसे चेहरे की भंगिमा, हाथों का इशारा, देखने का तरीका या शारीरिक मुद्रा, आदि का संवाद में बहुत महत्वपूर्ण स्थान होता है। याद कीजिए कई बार हम सिर्फ मुस्कराकर, ऊंगली दिखाकर, हाथों से इशारा कर कितना कुछ कह जाते हैं। हम अपनी मुद्राओं के माध्यम से हालांकि कुछ न कुछ तो कहते ही रहते हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि हमारी मुद्राओं को देखने वाला व्यक्ति भी हमारी मुद्राओं के वही अर्थ समझे, जो हम वाकई कहना चाहते हैं। क्योंकि एक ही मुद्रा का अर्थ अलग-अलग समाज और संस्कृति में अलग लगाया जा सकता है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि हमारी मुद्राएं हमारे बारे में इतना कुछ कहती हैं कि कई बार हम यह महसूस भी नहीं कर सकते हैं। एक ही शब्द अलग-अलग भंगिमा के साथ कहे जाने पर कभी गंभीर तो कभी अपमानजनक तौर पर ली जा सकती है। संप्रेषण विज्ञान पर काम करने वाले शोधार्थियों का मानना है कि हम जो कुछ भी कहते हैं उसके साथ यदि सही शारीरिक भाषा को भी जोड़ दिया जाए, तो हम उसके अर्थ का अधिक-से-अधिक सटीक संप्रेषण करने में सफल हो सकते हैं। यहां कुछ शारीरिक भंगिमाओं और मुद्राओं और उनके अर्थ की एक सूची दी जा रही है, लेकिन अलग-अलग परिस्थितियों में इसके अर्थ बदल भी सकते हैं। मुद्राएं (अर्थ) आगे की ओर पसरा हुआ हाथ (याचना करना),मुखाकृति बनाना (धीरज की कमी या अधीर), कंधे घुमाना फिराना या उचकाना (विदा होना, अनभिज्ञता जाहिर करना),मेज पर उंगलियों से बजाना (बेचैनी), मुट्ठी भींचना और थरथराना (गुस्सा), आगे की ओर उठी और सामने दिखती हथेली (रकिए और इंतजार कीजिए), अंगूठा ऊपर उठा हुआ (सफलता), अंगूठा गिरा हुआ (नुकसान), मुट्ठी बंद करना (डर), आंख मींचना (ऊबना), हाथ से किसी एक दिशा की ओर इशारा करना (जाने के लिए कहना),तेज ताली बजाना (स्वीकृति), धीरे से ताली बजाना (अस्वीकार, नापसंदगी). आज के जमाने में जब हर आदमी के पास समय बहुत कम होता है, ये मुद्राएं संवाद में बहुत काम आ सकती हैं और संप्रेषण में बहुत कारगर हो सकती हैं। भाषण, प्रस्तुति आदि में इन मुद्राओं का इस्तेमाल कर हम किसी खास विचार, भाव का आसानी से संप्रेषण कर सकते हैं या आसानी से अपने पक्ष में माहौल बना सकते हैं।
अगर स्त्रियों की बात करें तो कई बार कम खूबसूरत स्त्रियां अपनी बॉडी लैंग्वेज के चलते पुरुषों को अपना दीवाना बना लेती हैं। बहुत सी युवतियों की चाल, उनके बैठने, देखने और बात करने का अंदाज भर पुरुषों के भीतर उनके प्रति चाहत भड़काने लगता है। कई बार उनकी आंगिक भाषा से यह अनायास झलकता है और कई बार कुछ स्त्रियों द्वारा जानबूझकर शरीर की भाषा तय की जाती है। स्त्रियों के शरीर की बनावट भी ऐसी होती है कि वे उसका इस्तेमाल बड़ी आसानी से पुरुषों के भीतर सेक्स की चाह भड़काने के लिए कर सकती हैं। खास तौर पर उनके वक्ष, कमर और जांघें पुरुषों के लिए हमेशा आकर्षण का विषय होती हैं। इतना ही नहीं स्त्रियों की कुछ हरकतें हमेशा पुरुषों के भीतर काम भावना को भड़काती हैं। मसलन उनके होठों की हरकत, अपनी जीभ पर जुबान फेरना या फिर आहिस्ता-आहिस्ता कुछ खाना भी पुरुषों को दीवाना बना सकता है।स्त्रियां अपने सेक्सी लुक के प्रति भी जागरुक हो रही हैं। वे पहले के मुकाबले अपने चलने, उठने-बैठने के तरीके को लेकर ज्यादा सतर्क हो गई हैं। वे पहले की तरह अपनी सेक्स अपील को छिपाती नहीं है बल्कि उसे साफ या कई बार आक्रामक तरीके से सामने भी रखती हैं। पतली कमर, उन्नत स्तन और भरे हुए नितंब उनमें शर्म नहीं गर्व की भावना पैदा करते हैं।
पुरुषों के अंदाज शरीर की यह भाषा पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियों में भी काम करती है। आम तौर पर किसी कमरे में धीमी और सधी चाल से प्रवेश करने वाला पुरुष वहां बैठी स्त्रियों का ध्यान अनायास ही अपनी ओर आकर्षित कर सकता है। यह सधी चाल बताती है कि उसका अपने-आप पर कंट्रोल है। अब पुरुषों का खुद पर कंट्रोल होना सेक्स में कितनी अहमियत रखता है, शायद यह बताने की जरूरत नहीं... कई युवतियों को स्मोकिंग करने पुरुष भाते हैं, भले वे अपने भावी पति का सिगरेट पीना सख्त नापसंद करें।
जरा सोचिए, यदि ऑस्ट्रेलियाई तेज बॉलर के समक्ष कोई भारतीय बल्लेबाज लडखडाते कदमों से पहुंचे और कांपते हाथों से विकेट पर गार्ड ले, तो क्या होगा? सही सोच रहे हैं न आप-वह जल्दी ही पवेलियन लौट जाएगा। चलिए, सेंस बदलते हैं। कोई स्टूडेंट इंटरव्यू के लिए लडखडाते हुए कमरे में दाखिल हो और कांपते हाथों से अपने बायोडाटा की कॉपी इंटव्यूअर को सौंपे, तो क्या होगा? यदि उसने जल्द ही स्वयं को नहीं संभाला, तो एक्जिट गेट की ओर जल्द ही चल पडेगा। आत्मविश्वास की कमी हमारे जीवन में कितनी खलल पैदा करती है, यह सब शायद आपने भी कभी स्वयं में या फिर अपने मित्रों में महसूस किया होगा। क्यों होती है आत्मविश्वास में कमी, शायद इस स्तंभ में इतनी गहराई में जाने के लिए शब्द नहीं हैं। हां, कैसे आत्मविश्वास का सृजन किया जा सकता है, इस विषय में मैं 2008 में आठ कदम लेने की सलाह अवश्य दे सकता हूं :
1. यथार्थवादी बनिए : भरपूर आत्मविश्वास आपको सुपरमैन या सुपरवूमन नहीं बना सकता। आत्मविश्वास तो सिर्फ आपको अपनी क्षमताओं का पूरी तरह इस्तेमाल करते हुए सफलता की राह पर चलने में सहयोग भर दे सकता है। दूसरों से व्यर्थ की तुलना छोडिए और अपने लिए उपयुक्त राह पकडिए। अपने स्टैंडर्ड को ऊंचा रखिए और उन्हें निरंतर अपनी जीवनशैली, व्यवहार, संबंधों तथा प्रोफेशनल लाइफ में बढाते रहिए।
2. समझें अपनी श्रेष्ठता : किसी दिन कुछ घंटे आराम से बैठिए और रोजमर्रा की जिंदगी के बारे में सोचिए। आपको स्वयं में छोटे-छोटे कई सकारात्मक एवं उच्च कोटि के कौशल नजर आएंगे। परिजनों व मित्रों की भी सलाह ले सकते हैं। इनकी सूची बनाएं। इन खूबियों को निरंतर प्रयासों से बडा करने से ही आपमें अधिक आत्मविश्वास पैदा होना शुरू हो जाएगा।
3. नकारात्मकता का त्याग करें : स्वयं से पूछें, अब तक कहां पर आपकी नकारात्मक सोच ने आपको सकारात्मक नतीजे दिए हैं? अपने लक्ष्यों पर ध्यान दीजिए, लक्ष्य प्राप्ति के बाद की खुशी के बारे में सोचिए, सपनों को संवारिये और फिर हर नकारात्मक सोच को अपने मन पर विजय प्राप्त करते हुए विचारों की गोली से उडा दीजिए।
4. छोटी लडाइयां जीतें : आपको जीवन की एक बडी लडाई ही नहीं जीतनी है। छोटी-छोटी लडाइयां जीतकर ही आप संपूर्ण आत्मविश्वास के साथ विजय पथ पर चल सकेंगे। जैसे, फाइनल एग्जाम में अच्छे नंबर लाने से पहले हर क्लास टेस्ट में अधिक नंबर लाना अत्यंत आवश्यक है। इसी तरह यदि इंग्लिश लैंग्वेज में परेशानी होती है, तो सिर्फ एक कोर्स कर लेने मात्र से कुछ नहीं होगा। अपने लिए रोज की एक लडाई लडें-हर रोज 5 नए शब्द, हर सप्ताह 2 नए वाक्य। फिर देखिए अंग्रेजी भाषा पर की गई यह छोटी- सी विजय ही आपके आत्मविश्वास को कितना ऊंचा करती है।
5. गलतियों से सीखें : कहते हैं कि यदि मुंह के बल भी गिरे, तो जहां थे वहां से काफी आगे बढगए। गलतियों से घबराने के बजाय उसे प्राइस ऑफ लर्निग मानिए। हां, यदि वही गलती दुबारा करेंगे, तो केयरलेस कहलाएंगे।
6. सही करें बॉडी लैंग्वेज : कॉमेडी करने वाला एक्टर भी गंभीर हो सकता है। लेकिन एक्टिंग करते हुए वह सिर्फ कॉमेडी के हाव-भाव पर ही ध्यान देता है। अपने शरीर की भाषा पर ध्यान दीजिए। स्वच्छ शरीर, चेहरे पर मुस्कुराहट, शब्दों में मिठास, शरीर में चुस्ती और मन में टॉप ऑफ वर्ल्ड की सोच आत्मविश्वास में अवश्य इजाफा करेगी।
7. योजना बनाकर चलिए : दिन की शुरुआत अच्छे विचारों से हो, मन में निश्चय हो कि आज अमुक काम इतने बजे तक इस तरह से सफलता के साथ करना है, तो फिर किसी बात की कमी नहीं। कल और आने वाले हर दिन के लिए ऐसे ही तैयार रहें।
8. स्वयं को रिवार्ड दें : अपनी हर कामयाबी पर स्वयं को रिवार्ड अवश्य दें। इससे आत्मविश्वास बढेगा और कोई भी कार्य दोगुने उत्साह से कर पाएंगे। किसी ने सच कहा है, नो वन कैन मेक यू फील इनफीरियर विथाउट योर कंसेन्ट। हम यह जानते हैं कि शरीर स्वास्थ्य और ऊर्जा को लेकर प्राकृतिक तौर पर चिंतित रहता है। मनुष्य अपनी काया को दुरुस्त रखने के लिए पिछले 100 सालों से भी ज्यादा समय से लगा हुआ है। शरीर के किसी हिस्से में थोड़ी भी गड़बड़ी मचती है तो हम इसका अनुभव सहज भाव से कर लेते हैं।
हमें पता है कि जब हमारा शरीर ठीक से काम नहीं करता है तो यह समझते हुए देर नहीं लगती है कि कुछ-न-कुछ गड़बड़ चल रहा है। जब शरीर के स्तर पर कोई गड़बड़ी महसूस होती है तो उसे ठीक करने की कोशिश में हम जुट जाते हैं। हम डॉक्टर के नजदीक जाते हैं और मर्ज की दवा लेते हैं। हम अपनी तबियत ठीक करने के लिए तमाम उपायों का सहारा लेते हैं। शरीर को जिन उपायों से आराम मिलने की उम्मीद होती है, हम उसे अनिवार्य रूप से करने की कोशिश करते हैं। किसी भी बीमारी के लक्षण मसलन कैंसर, डायबिटीज, अथराइटिस, हाई ब्लड प्रेशर आदि के संकेत हमको नुकसान से आगाह करते हैं। हम जानते हैं कि अगर इनकी उपेक्षा की जाए तो निश्चित तौर पर इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। किसी मामले में अगर हम कुछ भी सामान्य से इतर महसूस करते हैं तो उसे सामान्य बनाने के लिए हरसंभव कोशिश करते हैं। हमारे शरीर को हमारी तबियत का अच्छा बुरा पता लग जाता है और अगर हमें अच्छा स्वास्थ्य लेकर जीना है तो शरीर की बात सुननी होगी। ठीक इसी तरह हमारा मन हमें यह बता देता है कि हमारे लिए क्या अच्छा और क्या बुरा है? शरीर की पीड़ा एक अलार्म की तरह होती है। सुखद बात तो यह है कि आपके मन में उठने वाले भाव और आवेग हमें निर्देश देने का काम करते हैं। आप इन संकेतों के सहारे जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि कर सकते हैं। आपका मन प्राकृतिक तौर पर शांत अवस्था में रहता है तब आपके स्वास्थ्य के अच्छे रहने की गारंटी बढ़ जाती है। आपका मन जब भी अशांत होता है तब आपको कुछ खाली-खाली सा लगने लगता है।
इन हालात में निश्चित तौर पर आपको खालीपन सा महसूस होने लगता है। क्या आपको पता है कि मनुष्य का शरीर बहुत जटिल होता है। आपकी मानसिक जटिलताओं को मन की शांति बहुत हदतक कम कर
देती है। सबसे बेहतर तो यह है कि आप अपने मन में उठने वाले संकेतों को पकड़ने की कोशिश कीजिए। निश्चित तौर पर आपके मन की अशांति आपको पीड़ित करने का काम करती है। आपका शरीर एक दूत की तरह होता है। वह मन तक संकेत पहुंचाने का काम करता है। लेकिन सच तो यह है कि बहुत सारे लोग शरीर की भाषा को पकड़ पाने में असर्थ होते हैं। अगली कड़ी में इसपर चर्चा करूंगा।
आज लोग इतने जयादा व्यस्त रहते हैं कि न तो उनके पास अपने बारे में बताने के लिए और न ही आपके बारे में जानने का समय होता हैं बाँडी लैंेग्वेज द्वारा आप दूसरों को समझ या समझ सकते हैं शरीर की मूक भाषा है बाँडी लैंग्वेजं इसके आधार पर हम किसीभी व्यकिंत के अंदर बसे विचारों और मनोभावें को समझ सकते हैं आपके खड़+े होने का,काम करने का व बोलने का तरीका आपके अंदर केविचारों को प्रकट करने से पहले ही आपका परिचय दे देता हैं कई बार आपने देखा होगा कि किसी से बात करते हुए काफी समय हो जाता है तो वह कभी घाड़+ी देखने लगता है,या आपकी बातों का ढंग से जवब देने की बजाय गर्दन हिला कर या हां या "ठीक है" कह कर बात खत्म करने लगता हैं ये हावभाव यह दर्शाते हैं कि आपका बैठना या बात करना उसे अच्छा नहीं लग रहा है,अत: ऐसे हावभावें से अपने आपको बचाना चाहिए नहीं तो आपके व्यकिंतत्व पर बुरा असर पड़+ता हैं ♦ हाथ मिलाने का तरीका भी हमारे उस व्यकिंत के साथ संबंधों को बताता हैं हाथ मिलाने के साथसाथ गर्मजोशी भी होनी चाहिए जिससे सामने वले को यह महसूस हो कि उसको मिलना आपको अच्छालग रहा हैं ♦ बातें करते समय हाथ बांधाकर खड़+ा होना अपकी घाबराहट को दर्शाता है व सामने वला यह सोचने लगता है कि आप उससे रक्षात्मक रूख अपना रहे हैं ऐसा करने से वह व्यकिंत आपसे दूर रहने की कोशिश करेगां ♦ कमर पर हाथ रखकर बातचीत न करें हमेशा सतर्क बैठ कर या सीघो खड़े होकर बातें करें इससे आपकी बातों का असर जयादा होगां ♦ बातें करते समय हाथों की मुद्राएं ठीक होनी चाहिए क्योंकि कई बार हम बोलते तो सोच समझ कर हैं पर हमारे हाथों की मुद्राएं कुछ और ही कह जाती हैं अत: हाथों को घुमाकर बातचीत नहीं करनी चाहिए. सही वक्यों के साथ सही मुद्राएं काफी अच्छा प्रभाव डालती हैं जो आपके व्यकिंतत्व को भी निखारता हैं ♦ कभी भी आंखें झुका कर बातें नहीं करनी चाहिए आंखें झुका कर बात करने को लोग आंख चुरा कर बात करना भी कहते हैं. हमेशा नजरें मिला कर बात करने वला ईमानदार व विश्वसपात्र माना जाता हैं इससे आपका आत्मविश्वस भी सामने वले को नजर आता हैं अत: आंखें मिला कर बातें करें ♦ स्पर्श एक ऐसा एहसास है जिसके प्रति संवेदनशील होना बाँडी लैंग्वेज का ही महत्वपूर्ण अंग हैं इससे आपको दूसरे को जानने व अपनी सि्थति उनके बीच मजबूत करने में सहायता मिलती हैं♦ हमेशा मुस्कुरा कर हर किसीसे मिलेंं मुस्कुराता चेहरा सबको र्पिय लगता हैं मुस्कान ऐसा यंत्र है जो आप मेंआत्मविश्वस लाता है और इसी आत्मविश्वस के कारण लोग आपकी बातों से इतने प्रभावित हो जाते हैं कि आप की बात की उपेक्षा नहीं कर पातें

3 comments:

  1. bahut sahi vishleshan hai sir! badhai!!

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